क्यों हो रही हैं कोरोना से इतनी ज्यादा मौतें, क्या है साइटोकाइन स्टॉर्म क्यों ले रहा है लोगों की जान
नई दिल्ली, नेशनल न्यूज कॉज, पूरी दुनिया में कोरोना ग्रसितों का आंकड़ा 4,722,233 (वर्ल्ड मीटर में अभी तक अपडेट) है. अभी तक 313,384 मौतें हो चुकी हैं. दुनिया के लगभग सभी देशों में कोरोना का संक्रमण है. कोरोना को लेकर कई रिसर्च भी सारी दुनिया में चल रही हैं. किन लोगों की किन परिस्थितियों में कोरोना से मौतें हो रही हैं इसको लेकर भी कई थ्योरी सामने आ रही हैं. अब जब लगभग 2 महीनों से सारी दुनिया में सारी मशीनरी ठप है और दुनिया के तमाम देश अब अपने नागरिकों से कोरोना के साथ जीने को कहने लगे हैं.
हमने विभिन्न स्रोतों से कुछ जानकारियां इकठ्ठी की हैं उन्हीं जानकारियों के आधार पर इस आलेख को तैयार किया गया है.
कोरोना से मरने वालों में ज़्यादातर वो लोग हैं जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी कमज़ोर है. इसका मतलब ये नहीं है कि अन्य लोगों की कोरोना की वजह से मौत नहीं हो रही है, मरने वालों में कई स्वस्थ और जवान भी शामिल हैं. कोरोना से होने वाली मौतों की सबसे बड़ी वजह क्या है?
हमारे शरीर में जब भी कोई बैक्टीरिया या वायरस इंट्री करता है तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) उससे लड़ती है और उसे कमज़ोर करके ख़त्म करने का प्रयास करती है. ये प्रतिरोधक क्षमता कई बार अधिक आक्रामक हो जाती है और किसी वायरस को ख़त्म करने की कोशिश में ख़ुद हमारे ही शरीर को नुक़सान पहुंचाने लगती है. वायरस से जिन कोशिकाओं की उन्हें सुरक्षा करनी होती है, ये लड़ाकू दस्ता उल्टा उन्हीं पर हमला बोल देता है. इस प्रकार ये बागी इम्यून सिस्टम ज़रूरत से ज़्यादा सक्रिय होकर रोगों से लड़ने के बजाय हमारे शरीर को ही नुक़सान पहुंचाने लगता है, तो उसे 'साइटोकाइन स्टॉर्म' (Cytokine Storm) कहते हैं.
साइटोकाइन स्टॉर्म क्या है, साईटकिन स्टॉर्म का अर्थ है प्रतिरोधक कोषों और उनके सक्रिय यौगिकों (cytokine) का आवश्यकता से अधिक उत्पादन. जब किसी फ्लू का संक्रमण होता है तो फेफड़ों में सक्रिय प्रतिरोधक कोषों की बाढ़-सी आ जाती है. इसका परिणाम यह होता है कि फेफड़े में जलन होती है और साथ ही वहाँ तरल पदार्थ जमा होने लगते हैं जिससे साँस लेने में कष्ट होने लगता है. ऐसी परिस्थिति में जीवाणु-जन्य निमोनिया होने का खतरा होता है जोकि रोगी की मृत्यु का कारण बन सकता है.
साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान इम्यून सेल फेफड़ों के पास जमा हो जाते हैं और फेफड़ों पर हमला करते हैं. इस प्रक्रिया में ख़ून की नसें फट जाती हैं. उनसे ख़ून रिसने लगता है और ख़ून के थक्के बन जाते हैं. नतीजतन शरीर का ब्लड प्रेशर कम हो जाता है. दिल, गुर्दे, फेफड़े और लिवर जैसे शरीर के महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद करने लगते हैं या कह सकते हैं कि ये शिथिल पड़ने लगते हैं.
जब किसी को फ्लू के संक्रमण के दौरान साईटकिन स्टॉर्म होता है तो उस समय फेंफडों में सक्रिय प्रतिरोधक कोषों में वृद्धि हो जाती है. परन्तु ये कोष एंटीजेन से लड़ने के स्थान पर फेंफडों में जलन पैदा कर देते हैं और उसके अन्दर तरल पदार्थ बढ़ा कर स्वास की समस्या उत्पन्न कर देते हैं. ज्ञातव्य है कि 1918-20 के स्पेनिश फ्लू में 5 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी. इसके पीछे साईटकिन स्टॉर्म का ही हाथ था. H1N1 स्वाइन फ्लू और H5N1 बर्ड फ्लू में भी साईटकिन स्टॉर्म के कारण अधिक प्रतिरोध क्षमता (High Immunity) वाले जवान भी मृत्यु को प्राप्त हुए थे. एक अवस्था तक इस स्थिति को जांच और इलाज के बाद नियंत्रित किया जा सकता है. कोविड-19 महामारी के मरीज़ों में इसे काबू करने के लिए क्या तरीक़ा हो सकता है? इसके बारे में कोई थ्योरी अभी नहीं दी जा सकती है. शरीर में जब भी साइटोकाइन स्टॉर्म होता है तो ये सेहतमंद कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है. खून के लाल और सफ़ेद सेल ख़त्म होने लगते हैं और जिगर को नुक़सान पहुंचाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान मरीज़ को तेज़ बुखार और सिरदर्द होता है. कई मरीज़ कोमा में भी जा सकते हैं. ऐसे मरीज़ हमारी समझ से ज़्यादा बीमार होते हैं. हालांकि अभी तक डॉक्टर इस परिस्थिति को महज़ समझ पाए हैं. जांच का कोई तरीक़ा हमारे पास नहीं है. कोविड-19 यानी कोरोना के मरीज़ों में साइटोकाइन स्टॉर्म पैदा होने की जानकारी दुनिया को वुहान के डॉक्टरों से ही मिली है. उन्होंने 29 मरीज़ों पर एक रिसर्च की और पाया कि उनमें आईएल-2 और आईएल-6 साइटोकाइन स्टोर्म के लक्षण थे.
साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान इम्यून सेल फेफड़ों के पास जमा हो जाते हैं और फेफड़ों पर हमला करते हैं. इस प्रक्रिया में ख़ून की नसें फट जाती हैं. उनसे ख़ून रिसने लगता है और ख़ून के थक्के बन जाते हैं. नतीजतन शरीर का ब्लड प्रेशर कम हो जाता है. दिल, गुर्दे, फेफड़े और लिवर जैसे शरीर के महत्वपूर्ण अंग काम करना बंद करने लगते हैं या कह सकते हैं कि ये शिथिल पड़ने लगते हैं.
जब किसी को फ्लू के संक्रमण के दौरान साईटकिन स्टॉर्म होता है तो उस समय फेंफडों में सक्रिय प्रतिरोधक कोषों में वृद्धि हो जाती है. परन्तु ये कोष एंटीजेन से लड़ने के स्थान पर फेंफडों में जलन पैदा कर देते हैं और उसके अन्दर तरल पदार्थ बढ़ा कर स्वास की समस्या उत्पन्न कर देते हैं. ज्ञातव्य है कि 1918-20 के स्पेनिश फ्लू में 5 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी. इसके पीछे साईटकिन स्टॉर्म का ही हाथ था. H1N1 स्वाइन फ्लू और H5N1 बर्ड फ्लू में भी साईटकिन स्टॉर्म के कारण अधिक प्रतिरोध क्षमता (High Immunity) वाले जवान भी मृत्यु को प्राप्त हुए थे. एक अवस्था तक इस स्थिति को जांच और इलाज के बाद नियंत्रित किया जा सकता है. कोविड-19 महामारी के मरीज़ों में इसे काबू करने के लिए क्या तरीक़ा हो सकता है? इसके बारे में कोई थ्योरी अभी नहीं दी जा सकती है. शरीर में जब भी साइटोकाइन स्टॉर्म होता है तो ये सेहतमंद कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है. खून के लाल और सफ़ेद सेल ख़त्म होने लगते हैं और जिगर को नुक़सान पहुंचाते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान मरीज़ को तेज़ बुखार और सिरदर्द होता है. कई मरीज़ कोमा में भी जा सकते हैं. ऐसे मरीज़ हमारी समझ से ज़्यादा बीमार होते हैं. हालांकि अभी तक डॉक्टर इस परिस्थिति को महज़ समझ पाए हैं. जांच का कोई तरीक़ा हमारे पास नहीं है. कोविड-19 यानी कोरोना के मरीज़ों में साइटोकाइन स्टॉर्म पैदा होने की जानकारी दुनिया को वुहान के डॉक्टरों से ही मिली है. उन्होंने 29 मरीज़ों पर एक रिसर्च की और पाया कि उनमें आईएल-2 और आईएल-6 साइटोकाइन स्टोर्म के लक्षण थे.
चीन वुहान में 150 कोरोना केस पर की गई एक रिसर्च से ये भी पता चला कि कोविड से मरने वालों में आईएल-6 सीआरपी साइटोकाइन स्टोर्म के मॉलिक्यूलर इंडिकेटर ज़्यादा थे. जबकि जो लोग बच गए थे उनमें इन इंडिकेटरों की उपस्थिति काफी कम थी. एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोविड-19 के मरीज़ों में प्रतिरोधक क्षमता के सेल्स फेफड़ों पर बहुत जल्दी और काफी तेज़ी से आक्रमण करते हैं जिससे फेफड़ों पर फ़ाइब्रोसिस नाम के निशान बन जाते हैं. ऐसा शायद कोरोना वायरस की अति सक्रियता की वजह से होता है.
कोरोना के समय अगर बाहर निकलें तो ये काम करें
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ऐसा पहली बार नहीं है कि साइटोकाइन स्टॉर्म का रिश्ता किसी महामारी से जोड़ कर देखा जा रहा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक़ 1918 में फैले फ्लू और 2003 में सार्स महामारी (सार्स महामारी का कारण भी कोरोना वायरस परिवार का ही एक सदस्य था) के दौरान भी शायद इसी वजह से बड़े पैमाने पर मौत हुईं थीं. इसी कारण शायद एच1एन1(H1 N1) स्वाइन फ़्लू से भी मरीज़ों की मौत हुई थी. वैज्ञानिकों का मानना है कि महामारियों वाले फ़्लू में मौत शायद वायरस की वजह से नहीं बल्कि मरीज़ के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक सक्रिय होने की वजह से होती है. जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही असंतुलित हो जाएगी तो मौत होना तय है.

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